भक्त सदा हीं सुहागरात मे जीता है। प्रतिपल प्रेमी से मिलन होने की आशा में जीता है।


शिव ही प्रारम्भ हैं, शिव ही अनंत हैं,शिव ही सभी इच्छाओं का अन्त हैं॥
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परमात्मा अनूठी शराब है जिसने वह शराब पी ली, फिर किसी शराब की कोई जरूरत न रही। और शराब कुछ ऐसी कि जीवन तरंगायित हो जाए,। जैसे दुल्हन सज कर चली, अपने प्रेमी को मिलने। 

भक्त सदा हीं सुहागरात मे जीता है। प्रतिपल उसके प्रेमी से मिलन होने की संभावना है। किस क्षण वीणा बज उठेगी, किस क्षण पुकार आ जाएगी। किस क्षण वह स्वीकार हो जाएगा--हर क्षण प्रतिक्षा का है । 


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भक्त को विवाद नहीं। दो भक्त मिल जाते है, बैठ जाते हैं पास, आंसुओं से बोलते हैं, रोंए - रोंए से बोलते हैं कंठ अवरुद्ध होगा, जैसे गले से कुछ निकलना चाहता है, निकल नहीं पाता। क्योंकि परमात्मा के लिए कहां से शब्द लाओ, उसकी याद भी कैसे कहो। 

जिक्रे - यार भी कैसे करो। उस प्यारे का वर्णन कैसे करो। कंठ रुक-रुक जाता है। हृदय में कुछ होता है, लहर उठती है, कंठ तक आती है, लेकिन प्रकट नहीं कर पाता... .... * ओशो * भक्ति सूत्र।